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शनिवार, 7 जुलाई 2012

हसरतें दिल की उड़ रही हैं हवा में ऐसे
अंगार दबे राख में यूँ पानी किसी ने डाला

रात भर साथ देने का वादा था समां का
न जाने हवा के झोकों ने कब बुझा दिया

काल-चक्र ने जब भीषण ज्वाला उगला
सबसे पहले आंसुओं ने घर अपना छोड़ा

चौखटों की हद पार कर आंसू  निकले
परदेश से लौटकर बेटा अपने घर आया

होंठ कापें,तन थर-थाराया,पलकें अपलक
आंसुओं ने बाहर आने का रास्ता न पाया

कम्पित तन रोम-रोम में कैक्टस उग आये
अजीब मिलन थी,चुभन में भी आनंद आया



 

      

फागुनी-एहसास

फागुन का एहसास हुआ आज
झुक गयी डाल
कचनार के
हजारों -हजार  फूल के बोझ से
मन-मदालस

आये फगुहार
मेरे आँगन
भंग के तरंग के साथ
फागुनी- पवन गाने फाग
फूल रहे हैं टेसू कपोलों पर
उमंगों की-रंगों की 
भरकर लायी भगोने
सज-धज कर आयी
खेलने होली
कोमलांगी धूप सालज्ज
आज  की सुबह
मेरे छत पर
नृत्य करते उमग-उमग कर
पीले पत्तों के बगूले
मसल डाला है नरम-नरम दूबों को
गुलाबी गुलाल के रज-कणों से

लाल रंग से सराबोर खड़ा है
गंजा बौराया सेमल
कर-तल कर उछल-उछल 
करतीं ठिठोलियाँ
छतनार महावट-पत्र,पीपल

भेद-भाव,बंधनों से परे
इन्द्रधनुषी रंगों का
यह सतरंगी एहसास
लेकर आया है मधुमास .
       


'बांधवगढ़ रास्ट्रीय उद्यान'में लगभग तीन वर्षों तक थाना प्रभारी रहा.वहां वन्य जीवन को बहुत नजदीक से देखने का अवसर प्राप्त हुआ. भ्रमण के दौरान मन में आये वन्य-प्राणियों के स्वाभाव एवं जीवन-शैली के कुछ प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करता हूँ.लाक्षणिकता एवं मानवीयकरण के दोष से बच नहीं पाया हूँ,लेकिन यही काव्य-बोध का सौंदर्य है.

मांद से निकल जब वनराज बहार आया
खग-मृग,वानरों  ने  खूब शोर मचाया                                                                                                 
हाथी चिंघाड़े तो बाघ भी पीछे हटता था
मरने पर उसके श्वानों ने दावत खूब उडाया             

अनजाने मृग मस्ती में कुलांचे भर रहे  
झाड़ी में छुपा है मृगराज घात लगाया

दिन बीता रात ढली कुछ हाथ न आया
बगुला की चालें,एक भी काम न आया

सतरंगी पंख फैलाये मोर मस्त नाच रहा
ये आवारापन मोरनियों को रास न आया

नभ में उड़ते गिद्ध धरा में नजर गड़ाये
सड़े-गले,जूठन पर ही आत्म-सुख पाया

तेजी,फुर्ती,चौकन्नापन ही जान बचाएगी
अरि,मित्रों ने एक ही ठांव पड़ाव जमाया.

रविवार, 1 जुलाई 2012

नियति

खन- खनाती चूड़ियों सी 
तोड़ती सन्नाटा माहौल की 
सैलाब बनकर 
तुम्हारी हंसी 


एक तरासे हुये बुत की तरह 
मुस्कुराहट अधरों पर मेरे 
तुम्हारा साथ देतीं 
आती किसी 
घुप- अंधियारे- गहवर से 
हटाती विशाल शिला को 
शंकित,संकुचित, बालात
भाव -पढ़ती
अर्थ ढूढती चौकन्नी 
असभ्य कहलाये जाने के भय से 

मजबूर करता है विगत 
यथार्थ, ढोंग को 
क्षण-प्रतिक्षण बदलता 
तुम्हारा स्वर 
तुम्हारा उन्माद अतिरंजित 
बहा न ले जाय कहीं 
 रेत में बने मेरे घरौंदे को .    
     

कवि सा मन

मेरे आँगन में जब कभी भी
उदासी आती है
बेला का गंध लेकर
और चांदनी रात में
हवा के कन्धों में सवार होकर
आते हैं रुआं-रुआं से बदल
फूट पड़ती हैं जैसे-
जटा से शिव की
सहस्त्र धारायें
मेरा कवि सा मन
पिघलने लगता है
हिमगिर के हिम सा
द्रवीभूत हो छन्द-बद्ध
भागीरथी के दो तटों के  
तरल अनुबंद्ध सा.
     

भाइयो माफ करना यदि बुरा लगे 
खरी बात करने की आदत पुरानी है 


कबीरा तो नहीं हूँ न ही बनना है 
आदर्श मेरा कबीर की जुबानी है 


मैं घर फूकने की बात नहीं करता 
व्यवस्था बदलने का सूत्र क़ुरबानी है 


राहगीर ठगे जाते हैं हर-बार क्यों 
जाति,धर्म सब बाटने की कहानी है


आश्वासन फूलते हैं,घोषनाएं पकती हैं
ऐ खोखले पेड़ो काफी एक चिनगारी है


यह बाग़ हमारी जागीर है पुस्तैनी
पीढ़ियों ने गाढे रक्त से की सिंचाई है


खोखले वृक्षों में बसेरा नहीं बनाना
पक्षियों,आंधियाँ इन्हीको गिरती हैं

वक्त



शुभ्र  धवल झीनी चादर
चांदनी बिछी अवनि-अम्बर  
मस्ती से सराबोर
फागुनी पवन आरपार 
करवट बदलती परछाइयाँ
डोलते ऊंचे नीलगिरि
ऊंघते सागोन
सर-सरती गुजरती
बीच से एक छाया
चंचल, शोख, हसीना
संगमर-मरी तन
सुरभित बदन
छलकती तरुणाई पोर-पोर
सलाखदार खिड़की और मै-
निर्निमेष! बेबस!!
कैद न किये जा सकने वाले क्षण 

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